वो जब तक कुर्सी पर रहे, राजनैतिक दल खौफ खाते रहे

शेषनवा को भैंसिया पर चढ़ाकर के गंगा जी में हेला देंगे – लालू प्रसाद यादव जी

12 दिसंबर 1990 को टी.एन. शेषन साहब भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने। ऐसे समय जब नौकरशाही का मतलब सरकार की जय-जयकार हो तब शेषन सरकार के खिलाफ खड़े हुए।

1991 यूपी विधानसभा चुनाव करवाते वक़्त शेषन ने करीब 50 हज़ार अपराधियों को ये विकल्प दिया था कि या तो अपनी जमानत ले लें या तो खुद को पुलिस को सौंप दें लेकिन ये तो सिर्फ शुरुआत थी।

भारत जब ये मान कर चलता था कि बिहार में साफ चुनाव करवाना एक सपना है क्योंकि 1984 के लोकसभा चुनाव में बिहार में 24 लोग मारे गए, 1985 के बिहार विधानसभा चुनाव में 63 लोग मारे गए। 1989 के आम चुनाव में 40 और 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में 87 लोग मारे गए। तब 1995 में शेषन ने बिहार चुनाव की चुनौती को स्वीकार किया और इतिहास रच दिया। चार बार विधानसभा चुनावों की तारीखें आगे बढ़ीं, पहली बार चुनाव चरणों में हुए और ये देश के इतिहास में सबसे लंबा चलने वाला विधानसभा चुनाव बन गया। 8 दिसंबर 1994 को चुनाव का एलान हुआ और आखिरी मतदान 28 मार्च 1995 को हुआ और पूरा चुनाव बेहद पारदर्शी तरीके से पूरा हुआ।

शेषन ने अनेक विरोधों के बावजूद चुनावों में पहचान पत्र को अनिवार्य किया और उन्होंने ही उम्मीदवार के चुनावी खर्चे की सीमा भी तय की। 11 दिसंबर 1996 को 5 बजे तक शेषन निर्वाचन आयुक्त के कमरे में बैठे और तब तक राजनेता और राजनीतिक दल टी.एन. शेषन के नाम से खौफ़ खाते रहे थे।

लेकिन कभी सरकारों की जड़ों को हिलाने वाले शेषन साहब आज एक ओल्ड एज़ होम में रहते हैं। उनके कोई संतान नही थी और धर्मपत्नी अब दुनिया मे नही हैं। दुनिया जिस शेषन की घटनाओं का जिक्र करती है, शेषन खुद उन सभी कामों को भूल चुके हैं। एक समय उनको भैंस पर बैठाने का सपना देखने वाले लालू यादव आज जेल में है और लालू यादव को ऐसे बातें करने के लिए मजबूर करने वाला वो इंसान अपनी याददाश्त खो कर अकेले एक चेन्नई के ओल्ड एज होम में जिंदगी काट रहा है।

* कहते हैं जिंदगी बड़ी अहसानफरामोश होती है, हम उसे जीना चाहते हैं और वो हमें मारने में लगी रहती है।

रुद्र प्रताप दूबे (Moments with Rudra)

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